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Tuesday, October 18, 2011

विद्यापति: एक आधार



विद्यापति भारतीय साहित्य की भक्ति परंपरा के प्रमुख स्तंभों मे से एक और मैथिली के सर्वोपरि कवि के रूप में जाने जाते हैं। इनके काव्यों में मध्यकालीन मैथिली भाषा के स्वरुप का दर्शन किया जा सकता है। इन्हें वैष्णव और शैव भक्ति के सेतु के रुप में भी स्वीकार किया गया है। मिथिला के लोगों को 'देसिल बयना सब जन मिट्ठा' का सूत्र दे कर इन्होंने उत्तरी-बिहार में लोकभाषा की जनचेतना को जीवित करने का महती प्रयास किया है।
मिथिलांचल के लोकव्यवहार में प्रयोग किये जानेवाले गीतों में आज भी विद्यापति की श्रृंगार और भक्ति रस में पगी रचनायें जीवित हैं। पदावली और कीर्तिलता इनकी अमर रचनायें हैं।मैथिल
कवि कोकिल, रसासिद्ध कवि विद्यापति, तुलसी, सूर, कबूर, मीरा सभी से पहले के कवि हैं। अमीर खुसरो यद्यपि इनसे पहले हुए थे। इनका संस्कृत, प्राकृत अपभ्रंश एवं मातृ भाषा मैथिली पर समान अधिकार था। विद्यापति की रचनाएँ संस्कृत, अवहट्ट, एवं मैथिली तीनों में मिलती हैं।
देसिल वयना अर्थात् मैथिली में लिखे चंद पदावली कवि को अमरच्व प्रदान करने के लिए काफी है। मैथिली साहित्य में मध्यकाल के तोरणद्वार पर जिसका नाम स्वर्णाक्षर में अंकित है, वे हैं चौदहवीं शताब्दी के संघर्षपूर्ण वातावरण में उत्पन्न अपने युग का प्रतिनिधि मैथिली साहित्य-सागर का वाल्मीकि-कवि कोकिल विद्यापति ठाकुर। बहुमुखी प्रतिमा-सम्पन्न इस महाकवि के व्यक्तित्व में एक साथ चिन्तक, शास्रकार तथा साहित्य रसिक का अद्भुत समन्वय था। संस्कृत में रचित इनकी पुरुष परीक्षा, भू-परिक्रमा, लिखनावली, शैवसर्वश्वसार, शैवसर्वश्वसार प्रमाणभूत पुराण-संग्रह, गंगावाक्यावली, विभागसार, दानवाक्यावली, दुर्गाभक्तितरंगिणी, गयापतालक एवं वर्षकृत्य आदि ग्रन्थ जहाँ एक ओर इनके गहन पाण्डित्य के साथ इनके युगद्रष्टा एवं युगस्रष्टा स्वरुप का साक्षी है तो दूसरी तरफ कीर्तिलता, एवं कीर्तिपताका महाकवि के अवह भाषा पर सम्यक ज्ञान के सूचक होने के साथ-साथ ऐतिहासिक साहित्यिक एवं भाषा सम्बन्धी महत्व रखनेवाला आधुनिक भारतीय आर्य भाषा का अनुपम ग्रन्थ है। परन्तु विद्यापति के अक्षम कीर्ति का आधार, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, है मैथिली पदावली जिसमें राधा एवं कृष्ण का प्रेम प्रसंग सर्वप्रथम उत्तरभारत में गेय पद के रुप में प्रकाशित है। इनकी पदावली मिथिला के कवियों का आदर्श तो है ही, नेपाल का शासक, सामंत, कवि एवं नाटककार भी आदर्श बन उनसे मैथिली में रचना करवाने लगे बाद में बंगाल, असम तथा उड़ीसा के वैष्णभक्तों में भी नवीन प्रेरणा एवं नव भावधारा अपने मन में संचालित कर विद्यापति के अंदाज में ही पदावलियों का रचना करते रहे और विद्यापति के पदावलियों को मौखिक परम्परा से एक से दूसरे लोगों में प्रवाहित करते रहे।
कवि कोकिल की कोमलकान्त पदावली वैयक्तिकता, भावात्मकता, संश्रिप्तता, भावाभिव्यक्तिगत स्वाभाविकता, संगीतात्मकता तथा भाषा की सुकुमारता.......आगे पढ़े

Friday, July 15, 2011

हिटलर! एक सच्चाई

हिटलर जिसका पुरा नाम एडोल्फ हिटलर था । हिटलर को बीसवीं सदी के सर्वाधिक घृणित, क्रूर और बदनाम शासक के तौर पर याद किया जाता है । इसके मुख्य कारण हिटलर में युद्ध की मानसिकता, जातिवाद, फासिस्टवादी विचारधारा का होना था। हिटलर का जन्म 20अप्रैल 1889 को ऑस्ट्रिया में हुआ । हिटलर के पिता अलाइस हिटलर की तीन शादीयाँ हुई थी । इनकी तीसरी पत्नी क्लारा थी इसने ही हिटलर को जन्म दिया । हिटलर ने प्राथमिक शिक्षा लिंज़ के रीयल स्कूल में प्राप्त किया । 3जनवरी 1903को हिटलर की पिता के मृत्यु के बाद हिटलर की माँ भी बीमारी से ग्रस्त हो गयी जिससे हिटलर अपने आपको कमजोर महसूस करनें लगा । १९०६ में हिटलर को पारिवारिक और शैक्षिक कारणों से वियना जाना पड़ा । पहली नज़र में वियना ने हिटलर को बहुत आकर्षित किया मगर वियना को जानने के बाद वियना के खोखले चकाचौन्ध से हिटलर को बहुत निराशा हुई । इसी कुछ महीनो के दरम्यान हिटलर का सामना कुछ और निराशाओं से हुआ जैसे वियाना के फाईन आर्टस एकेडमी में दाखिला नही मिलना तथा २१ दिसम्बर १९०७ को उनकी माँ क्लारा की मृत्यु । हिटलर ने वियना में कुछ साल बुरे वक्त के गुजारे। हिटलर ने अपनी आत्मकथा "मेरा संघर्ष" में लिखा है - वियना मेरे लिए कठोर स्कूल जैसा था क्योकि यहाँ मै जिंदगी का महत्वपूर्ण सबक सीख पाया। यही मैंने अपनी सोंच और आदर्श की नींव रखी । हिटलर मौलिकता और क्रूरता को उद्येश्य प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण मानता था । हिटलर के दिल में यहूदियों के लिए नफ़रत......... आगे पढ़े

Sunday, June 21, 2009

राष्ट्रपिता ने कहा था कि वह 50 साल की जिंदगी में 100 साल का काम कर गए।

विख्यात स्वतंत्रता सेनानी और महात्मा गांधी के करीबी महादेव देसाई एक कुशल नेता ही नहीं कर्मठ कार्यकर्ता, सशक्त लेखक एवं पत्रकार तथा प्रबंधन में माहिर थे और इन्हीं खूबियों के कारण राष्ट्रपिता ने कहा था कि वह 50 साल की जिंदगी में 100 साल का काम कर गए।
महादेव देसाई को लोग प्राय: महात्मा गांधी के निजी सचिव के रूप में जानते हैं, लेकिन बापू उनको अपने पुत्र के रूप में देखते थे। गांधी और देसाई की पहली ही मुलाकात में महात्मा ने उनकी छिपी हुई विशेषताओं को पहचान लिया था और उन्हें अपने साथ आकर काम करने का न्यौता दिया था।
देसाई की रचनाओं पर काम कर रहे उत्तम सिन्हा ने बताया कि महादेव शुरू से ही गांधी के विचारों से प्रभावित थे। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद जब गांधी ने अपने प्रस्तावित आश्रम के नियमों के बारे में जनता की राय मांगी तो उसी संबंध में इन दोनों की मुलाकात हुई। पहली मुलाकात में गांधी की पारखी आंखों ने इस हीरे की पहचान कर ली। सिन्हा ने बताया कि महात्मा गांधी के नजदीक रहने वाले लोगों को व्यक्तिगत जीवन में कड़ी परीक्षाओं से गुजरना पड़ता था। देसाई तो उनके निजी सचिव थे लिहाजा वह रात में देर-देर तक जाग कर महात्मा गांधी से जुड़े काम करते थे। उनके पत्र व्यवहार को व्यवस्थित करते थे।
सिन्हा ने कहा कि महादेव देसाई सोलह-सोलह घंटे काम करते थे। इनमें महात्मा गांधी के काम के अलावा नवजीवन के लिए लेखन डायरी लेखन तथा अन्य काम शामिल थे। यही कारण था कि वह सदैव महात्मा गांधी के प्रिय और विश्वस्त बने रहे।
सूरत के सरस गांव में एक जनवरी 1982 को जन्मे महादेव देसाई बचपन से ही पढ़ाई में काफी कुशल थे। उन्होंने छात्रवृत्ति के जरिए उच्च शिक्षा ग्रहण की स्नातक के बाद उन्होंने एलएलबी की डिग्री हासिल की। पढ़ाई के दौरान देसाई ने धन की कमी को पूरा करने के लिए लार्ड मोर्ले की रचना का गुजराती में अनुवाद किया, जिसके लिए उन्हें गुजरात फो‌र्ब्स सोसाइटी की ओर एक हजार रुपये का इनाम मिला। देसाई भले ही खेलकूद में रुचि नहीं रखते थे, लेकिन वह पैदल चलने के बेहद शौकीन थे और दिन में 18-20 मील तक पैदल चलते थे।
देसाई और गांधी की पहली मुलाकात तीन नवंबर 1917 को गोधरा में हुई और इसके बाद से दोनों के बीच ऐसा संबंध बना जो 15 अगस्त 1942 तक बरकरार रहा। गांधी से पहली मुलाकात के दिन से ही देसाई ने डायरी लिखना शुरू कर दिया और यह क्रम उनकी मृत्यु के एक दिन पहले यानी 14 अगस्त तक जारी रहा। देसाई की डायरियां 20 खंड में प्रकाशित हुई हैं। यह महात्मा गांधी के चरित्र और दर्शन को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। देसाई ने चंपारण नमक सत्याग्रह, बारदोली जैसे आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। इसी क्रम में उनका जेल आने जाने का क्रम भी जारी रहा।
देसाई के व्यक्तित्व का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष पत्रकारिता था। महात्मा गांधी ने मोतीलाल नेहरु के अनुरोध पर देसाई को 1921 में उनके अखबार द इंडिपेंडेंट चलाने के लिए इलाहाबाद भेजा। बाद में मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरु के जेल जाने पर इस अखबार के संपादन का भार देसाई पर आ गया। ब्रिटिश सरकार द्वारा इस अखबार पर लगाई गई तमाम पाबंदियों के कारण देसाई ने यह अखबार एक साल तक साइकिलोस्टाइल पर निकाला। बाद में देसाई की गिरफ्तारी होने पर महात्मा गांधी के पुत्र देवदास गांधी ने इस अखबार को निकाला और देसाई की पत्नी दुर्गाबेन ने सक्रिय सहयोग दिया।
देसाई को 1924 में नवजीवन के संपादन का जिम्मा मिला। विभिन्न समसामायिक घटनाओं पर गांधी दर्शन के अनुरूप प्रतिक्रिया के अलावा देसाई ने महात्मा गांधी की गुजराती में लिखी आत्मकथा सत्य के साथ प्रयोग का अंग्रेजी में अनुवाद किया। यही नहीं उन्होंने देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु की आत्मकथा द आटोबायोग्राफी का गुजराती में अनुवाद भी किया। उन्हें नौ अगस्त 1942 में गिरफ्तार कर आगा खान महल में रखा गया। ब्रिटिश सरकार द्वारा इस महल को जेल का स्वरुप दिया गया था और उस समय इसमें महात्मा गांधी, सरोजनी नायडू एवं मीराबेन भी कैद थीं। यहीं 14 और 15 अगस्त की मध्य रात्रि को देसाई का निधन हुआ। उनके निधन के बाद महात्मा गांधी के निर्देश पर वहीं उनकी समाधि बनवाई गई और इस समाधि पर न केवल ओम लिखा गया, बल्कि एक क्रास का निशान भी बनाया गया।
मीराबेन के अनुसार गांधीजी ने कई बार इस समाधि पर आकर फूल चढ़ाए। वह हर बार क्रास पर फूल चढ़ाते थे। देसाई के निधन के अगले ही साल कस्तूरबा का निधन हुआ और उनकी भी समाधि देसाई की समाधि के नजदीक ही बनाई गई।

कुछ अन्य पोस्ट :भगत सिंह से जुड़े कुछ दस्तावेज़.......(भाग-१)भगत सिंह से जुड़े कुछ दस्तावेज़.......(भाग-2)भगत सिंह से जुड़े कुछ दस्तावेज़.......(भाग-3)भगत सिंह से जुड़े कुछ दस्तावेज़....... (भाग-4)असेंबली बमकांड मामले की एफ़आईआर और धमाके के बाद फेंका गया पर्चा का हिंदी अनुवाद भगत सिंह का युवाओ,विद्यार्थियों के नाम एक पत्र, स्वतंत्रता का पौधा शहीदों के रक्त से फलता है(घोषणा पत्र), मैं नास्तिक क्यों हूँ: भगत सिंह, गाँधी जी के नाम खुली चिट्ठी, स्वात में शरिया लागू करने को मंज़ूरी, 'पाक मंशा और प्रतिबद्धता पर सवाल', क्यूबा के प्रति अमरीकी नीति में बदलाव, 'कांग्रेस ने अंबेडकर के साथ न्याय नहीं किया' ,किसी कोने में रोता नहीं मिलूँगा: मनमोहन, प्रजातंत्र का एक पहलु सन् 1977 ,विश्वयुद्ध के भारतीय जाँबाज़ों की यादें, ग्रेट इंडियन चुनाव, इराक़ में आत्मघाती हमला, 11 की मौत, चुनाव पर क्या है माओवादियों का रवैया? ,1857: हिंदुस्तान का ख़याल, धर्म का असर ,ममता की एक मूरत: एक परिचय , नेहरु-गांधी परिवार का आनंद भवन , क्या भारत गाँधी को भूल गया है? , क्या थे महात्मा गांधी के अंतिम शब्द! , किन परिस्थितियों में हुआ ऑपरेशन ब्लूस्टार.. ,व्यवस्था नौजवानों को उनकी विरासत नहीं देना चाहती ,'अफ़ग़ानिस्तान में बिगड़ रहे हैं हालात' ,अयोध्या विवाद से संबंधित अहम कागज़ात ग़ायब, अयोध्या में विवाद का इतिहास............? ,ऐसा कब तक चलेगा ? ,'बदलते भारत का आईना है सिनेमा' ,विद्रोह में लोक साहित्य की अहम भूमिका,जहाँ कपड़े पहनना प्रतिबंधित होगा ,बर्लिन दीवार का हिस्सा नीलाम हुआ,महादेवी: रचयिता संवेदनशील संस्मरणों की,नजरिया जिंदगी का,विदेश में कोई भारतीय चेहरा नज़र आता है तो एक अपनेपन का अहसास होता है. ,राष्ट्रपिता ने कहा था कि वह 50 साल की जिंदगी में 100 साल का काम कर गए।

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