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Saturday, June 20, 2009

राष्ट्रपिता ने कहा था कि वह 50 साल की जिंदगी में 100 साल का काम कर गए।

विख्यात स्वतंत्रता सेनानी और महात्मा गांधी के करीबी महादेव देसाई एक कुशल नेता ही नहीं कर्मठ कार्यकर्ता, सशक्त लेखक एवं पत्रकार तथा प्रबंधन में माहिर थे और इन्हीं खूबियों के कारण राष्ट्रपिता ने कहा था कि वह 50 साल की जिंदगी में 100 साल का काम कर गए।
महादेव देसाई को लोग प्राय: महात्मा गांधी के निजी सचिव के रूप में जानते हैं, लेकिन बापू उनको अपने पुत्र के रूप में देखते थे। गांधी और देसाई की पहली ही मुलाकात में महात्मा ने उनकी छिपी हुई विशेषताओं को पहचान लिया था और उन्हें अपने साथ आकर काम करने का न्यौता दिया था।
देसाई की रचनाओं पर काम कर रहे उत्तम सिन्हा ने बताया कि महादेव शुरू से ही गांधी के विचारों से प्रभावित थे। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद जब गांधी ने अपने प्रस्तावित आश्रम के नियमों के बारे में जनता की राय मांगी तो उसी संबंध में इन दोनों की मुलाकात हुई। पहली मुलाकात में गांधी की पारखी आंखों ने इस हीरे की पहचान कर ली। सिन्हा ने बताया कि महात्मा गांधी के नजदीक रहने वाले लोगों को व्यक्तिगत जीवन में कड़ी परीक्षाओं से गुजरना पड़ता था। देसाई तो उनके निजी सचिव थे लिहाजा वह रात में देर-देर तक जाग कर महात्मा गांधी से जुड़े काम करते थे। उनके पत्र व्यवहार को व्यवस्थित करते थे।
सिन्हा ने कहा कि महादेव देसाई सोलह-सोलह घंटे काम करते थे। इनमें महात्मा गांधी के काम के अलावा नवजीवन के लिए लेखन डायरी लेखन तथा अन्य काम शामिल थे। यही कारण था कि वह सदैव महात्मा गांधी के प्रिय और विश्वस्त बने रहे।
सूरत के सरस गांव में एक जनवरी 1982 को जन्मे महादेव देसाई बचपन से ही पढ़ाई में काफी कुशल थे। उन्होंने छात्रवृत्ति के जरिए उच्च शिक्षा ग्रहण की स्नातक के बाद उन्होंने एलएलबी की डिग्री हासिल की। पढ़ाई के दौरान देसाई ने धन की कमी को पूरा करने के लिए लार्ड मोर्ले की रचना का गुजराती में अनुवाद किया, जिसके लिए उन्हें गुजरात फो‌र्ब्स सोसाइटी की ओर एक हजार रुपये का इनाम मिला। देसाई भले ही खेलकूद में रुचि नहीं रखते थे, लेकिन वह पैदल चलने के बेहद शौकीन थे और दिन में 18-20 मील तक पैदल चलते थे।
देसाई और गांधी की पहली मुलाकात तीन नवंबर 1917 को गोधरा में हुई और इसके बाद से दोनों के बीच ऐसा संबंध बना जो 15 अगस्त 1942 तक बरकरार रहा। गांधी से पहली मुलाकात के दिन से ही देसाई ने डायरी लिखना शुरू कर दिया और यह क्रम उनकी मृत्यु के एक दिन पहले यानी 14 अगस्त तक जारी रहा। देसाई की डायरियां 20 खंड में प्रकाशित हुई हैं। यह महात्मा गांधी के चरित्र और दर्शन को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। देसाई ने चंपारण नमक सत्याग्रह, बारदोली जैसे आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। इसी क्रम में उनका जेल आने जाने का क्रम भी जारी रहा।
देसाई के व्यक्तित्व का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष पत्रकारिता था। महात्मा गांधी ने मोतीलाल नेहरु के अनुरोध पर देसाई को 1921 में उनके अखबार द इंडिपेंडेंट चलाने के लिए इलाहाबाद भेजा। बाद में मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरु के जेल जाने पर इस अखबार के संपादन का भार देसाई पर आ गया। ब्रिटिश सरकार द्वारा इस अखबार पर लगाई गई तमाम पाबंदियों के कारण देसाई ने यह अखबार एक साल तक साइकिलोस्टाइल पर निकाला। बाद में देसाई की गिरफ्तारी होने पर महात्मा गांधी के पुत्र देवदास गांधी ने इस अखबार को निकाला और देसाई की पत्नी दुर्गाबेन ने सक्रिय सहयोग दिया।
देसाई को 1924 में नवजीवन के संपादन का जिम्मा मिला। विभिन्न समसामायिक घटनाओं पर गांधी दर्शन के अनुरूप प्रतिक्रिया के अलावा देसाई ने महात्मा गांधी की गुजराती में लिखी आत्मकथा सत्य के साथ प्रयोग का अंग्रेजी में अनुवाद किया। यही नहीं उन्होंने देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु की आत्मकथा द आटोबायोग्राफी का गुजराती में अनुवाद भी किया। उन्हें नौ अगस्त 1942 में गिरफ्तार कर आगा खान महल में रखा गया। ब्रिटिश सरकार द्वारा इस महल को जेल का स्वरुप दिया गया था और उस समय इसमें महात्मा गांधी, सरोजनी नायडू एवं मीराबेन भी कैद थीं। यहीं 14 और 15 अगस्त की मध्य रात्रि को देसाई का निधन हुआ। उनके निधन के बाद महात्मा गांधी के निर्देश पर वहीं उनकी समाधि बनवाई गई और इस समाधि पर न केवल ओम लिखा गया, बल्कि एक क्रास का निशान भी बनाया गया।
मीराबेन के अनुसार गांधीजी ने कई बार इस समाधि पर आकर फूल चढ़ाए। वह हर बार क्रास पर फूल चढ़ाते थे। देसाई के निधन के अगले ही साल कस्तूरबा का निधन हुआ और उनकी भी समाधि देसाई की समाधि के नजदीक ही बनाई गई।

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Friday, June 19, 2009

विदेश में कोई भारतीय चेहरा नज़र आता है तो एक अपनेपन का अहसास होता है.

सलमा ज़ैदी का लेख
विदेश में कोई भारतीय चेहरा नज़र आता है तो एक अपनेपन का अहसास होता है।
हालाँकि लंदन में यह महसूस होता ही नहीं कि आप भारत से बाहर हैं लेकिन अन्य यूरोपीय देशों में बसे भारतीय दोस्तों से जब बात होती है तो उनसे यही सुनने को मिलता है.
अकसर ट्रेन में आते-जाते सामने बैठे भारतीयों को देख कर दिल जितना ख़ुश होता है, उन्हें आपस में अंग्रेज़ी में बात करते देख कर उतनी ही निराशा भी होती है.
मैं यह नहीं कहती कि हर भारतीय की मातृभाषा हिंदी ही है और वे उसे फ़र्राटे से बोल लेते हैं लेकिन मैं बात कर रही हूँ उन हिंदी भाषियों की जिन्हें हिंदी बोलने में झिझक महसूस होती है.
ऐसा कई बार हुआ कि मैंने किसी उत्तर भारतीय से हिंदी में सवाल किया और जवाब अंग्रेज़ी में मिला.

सोचते किस भाषा में हैं?
बहुत से फ़िल्मी सितारे लंदन आते रहते हैं. उनमें से बहुत कम हैं जो सहजता से हिंदी बोल पाते हों.
जो भाषा आपको रोज़ी-रोटी मुहैया करा रही है उससे ऐसी विमुखता?
लेकिन बात विदेश की ही क्यों क्या भारत में ऐसा नहीं है?
राजधानी या शताब्दी एक्सप्रेस से सफ़र करते हुए जब मैंने हिंदी अख़बार की मांग की तो अटेंडेंट को जाकर मेरे लिए अख़बार लाना पड़ा.
आज़ादी के साठ साल बाद आज भी अंग्रेज़ी बोलना गर्व और हिंदी बोलना शर्म की बात क्यों है?
क्या आने वाली पीढ़ी हिंदी के समृद्ध साहित्य से परिचित भी हो पाएगी? हम अपने बच्चों को इस विराट विरासत से महरूम क्यों कर रहे हैं?

Wednesday, June 17, 2009

नजरिया जिंदगी का

हिन्दी जगत, हिन्दी साहित्य की एक ऐसी काव्य रचना जिसने साहित्य जगत में अपनी एक अलग पहचान स्थापित की। आज के युवा जो व्यवसायीकरण से लाचार होकर अपने राष्ट्रभाषा से विमुख होते जा रहे है उन्हें यह काव्य रचना हिन्दी से जोड़े रख सकती है और उन युवाओ को जिंदगी जीने का नजरिया दे सकती है जिनके कदम आतंकवाद और अन्य हिंसक कार्यो की तरफ़ बढ़ रहें है। तो आइये युवाजोश के साथ नजरिये को एक राह दिखाएँ और राष्ट्रहित के लिए अपने कदम जोश के साथ आगे बढाये ....यहाँ क्लिक कर पढ़े.


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