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Wednesday, December 3, 2008

डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद के जन्म दिवस पर


आज डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद का जन्म दिवस है, मगर देश में इतनी बड़ी घटना होने के बाद लोगो का रुझान मुंबई की खबरों पर है जिस कारण आज राजेंद्र प्रसाद जी के बारे में न ही ज्यादा पढने को मिला और ना ही न्यूज़ चनलो पर इस ख़बर को एहमियत दी गई। मगर उनकी एहमियत तो हमारे दिल में है और हमेशा बनी रहेगी। प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद का जन्म 3 दिसम्बर 1884 को हुआ था। जब वह कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन के सभापति चुने गए तो जनता उन्हे देखने को बेचैन थी पर वह कहीं न दिखे। लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि जिस व्यक्ति को मंच की ओर बढ़ता देख लोग भीड़ में धक्के दे रहे थे, वही जब किसी तरह मंच तक पहुंचा तो लोगों ने उन्हें फूल मालाओं से लाद दिया। एक बार उन्हें बिहार के एक छोटे शहर जाना था। उन्हें देर हो गई तो आयोजक निराश होकर अपने काम में लग गए। उनकी मोटर फेल हो गई थी। वह आठ बजे वाली ट्रेन से आए। चूंकि किसी को कोई सूचना न थी इसलिए कोई स्टेशन भी न आया। वह गाड़ी से उतरे और स्टेशन मास्टर के दफ्तर पहुंचकर बोले, 'जरा फोन करना है।' अपने रौब में स्टेशन मास्टर ने कहा, 'कौन हो तुम?' वह इतना भर बोले कि राजेन्द्र प्रसाद..कि स्टेशन मास्टर पुन: उबल पड़ा, 'अरे, राजेन्द्र प्रसाद नहीं आए आज।' जब उसे सच्चाई पता लगी तो दंग रह गया।
जब राजेन्द्र बाबू कांग्रेस के सभापति थे तो उन्हीं दिनों किसी मौके पर इलाहाबाद आए। तब 'लीडर' के संपादक थे सीवाई चिंतामणि। राजेन्द्र बाबू उनसे मिलने गए। शाम हो रही थी। राजेन्द्र बाबू ने चपरासी को अपना कार्ड दिया। चपरासी ने जाकर देखा कि चिंतामणि कुछ लिख रहे थे। चपरासी की टोकने की हिम्मत न हुई और कार्ड मेज पर रखकर चुपचाप बाहर आ गया और अलाव के पास बैठ गया। कुछ देर तक तो राजेन्द्र बाबू आसरा देखते रहे फिर जब कंपकपी लगी तो खुद भी आग तापने लगे। लगभग एक घंटे के बाद चिंतामणि की दृष्टि कार्ड पर गई और देखा कि वह तो कांग्रेस के सभापति का कार्ड है तो दौड़कर बाहर आए और पूछा कि कितनी देर से यह कार्ड पड़ा है। चपरासी ने बताया कि एक घंटे से। चिंतामणि जी को बड़ा दु:ख हुआ। सोचा कि राजेन्द्र बाबू अवश्य ही लौट गए होंगे। फिर भी पूछा, 'कौन आया था?' 'एक आदमी लाया था। वहां आग ताप रहा है।' वह बोले,'अच्छा, उसे बुलाओ।' जब उस जगह से स्वयं राजेन्द्र बाबू उठकर आए तो चिंतामणि स्तब्ध रह गए। कांग्रेस का सभापति और इतनी सादगी। गांधीजी के सच्चे अनुयायी राजेन्द्र बाबू 28 फरवरी 1963 को इस संसार से सदा के लिए विदा हो गए।.... ..... ..... ..... ..... ..... ....विस्तार से उनकी जीवनी पढने के लिए यहाँ क्लिक करें।

1 comments:

  1. राजेन्द्र बाबु जैसे सादा जीवन और उच्च विचार वाले इंसान को पाकर राष्ट्रपति पद भी धन्य हो गया था। आज के दौर में तो विश्वास ही नहीं होता कि राजेन्द्र प्रसादजी या शास्त्रीजी जैसे महापुरुष कुछ ही सालों पहले हमारे बीच थे।

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