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Wednesday, April 15, 2009

प्रजातंत्र का एक पहलु सन् 1977

जिसने सन् 1977 में जन्म लिया होगा, आज उसकी उम्र 32 वर्ष के आसपास होगी.
एक पूरी पीढ़ी ऐसी है जिसे आपातकाल के बारे में कुछ पता ही नहीं, क्योंकि उसका जन्म ही आपातकाल समाप्त होने के बाद हुआ है.
पर यह विडंबना है कि आज तक इस बात की छानबीन ही नहीं हुई है कि आख़िर आपातकाल लगा क्यों था और क्यों वह केवल डेढ़ साल का जीवन ही जी पाया.
कई सवाल हैं जिनका उत्तर आना बाकी है. जैसे कि क्या इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह फ़ैसला, जिसमें उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का चुनाव रद्द कर दिया था, इसका कारण बना था.
या फिर लोकनायक जयप्रकाश नारायण का वह बयान जिसमें उन्होंने पुलिस और सेना से ग़लत आदेश न मानने की अपील की थी.
गुजरात का छात्र आंदोलन लगभग शांत हो गया था तथा बिहार का छात्र आंदोलन, बिहार से आगे प्रभावी रूप से नहीं बढ़ पा रहा था.
बिहार के छात्र आंदोलन पर राजनीति दलों का कब्ज़ा हो गया था और यही सबसे बड़ी विडम्बना थी कि इस आंदोलन में लोकनायक जयप्रकाश नारायण इसी शर्त पर शामिल हुए थे कि आंदोलन निर्दलीय रहेगा.
क्या इंदिरा गाँधी को उनके उस समय के सलाहकारों ने हद से ज़्यादा डरा दिया था या उनके खुफ़िया विभाग ने अपनी महत्ता दिखाने के लिए अतिरंजित रिपोर्ट सौंपी थी.
क्योंकि जिस डर से आपातकाल लगा था वैसा कुछ आपातकाल में नहीं हुआ.
लोकनायक जयप्रकाश नारायण सहित सारे बड़े नेता जेल भेज दिए गए. इनमें चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी तथा कांग्रेस के चंद्रशेखर और मोहन धारिया शामिल थे.
लेकिन जनता आपातकाल का विरोध नहीं कर रही थी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और दूसरे विपक्षी दलों के स्थानीय नेता खामोश बैठे थे.
कुछ सक्रिए गुट थे जो एकाकी पड़ते जा रहे थे. जार्ज फर्नांडिस विरोध की कोशिश कर रहे थे पर जनता उनसे जुड़ नहीं पा रही थी.
यह अंदाज़ा ग़लत साबित हुआ कि जनता लोकतंत्र बहाली के लिए सड़कों पर उतर आएगी.
आपातकाल के शुरुआती दौर में जनता ने आपातकाल का समर्थन किया पर छह महीने बीतते बीतते उसे प्रशासन और राजनेताओं की ज़्यादती से गुज़रना पड़ा.
संभवतः इंदिरा गाँधी के पास ज़्यादती के समाचार पहुँच ही नहीं पा रहे थे क्योंकि उनका सूचना तंत्र पंगु बन चुका था.
क्यों इंदिरा गाँधी ने आपातकाल वापस लेकर चुनाव कराने का फ़ैसला लिया, यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है.
इंदिरा गाँधी के विरोधी कहेंगे कि वे डर गई थीं, और उनके समर्थक कहेंगे कि जैसे ही उन्हें ज़्यादतियों का पता चला उन्होंने चुनाव करा दिया और यह कि वे लोकतंत्र समर्थक थीं, उसकी विरोधी नहीं.
पर यदि वे चुनाव नहीं करातीं तो क्या होता? क्या उस समय के राजनेताओं में और आज के राजनेताओं में कोई बुनियादी अंतर है?

पहले के नेता
बात करने पर लोग बताते हैं कि पहले के नेता ज़्यादा अच्छे थे। इनमें वे भी शामिल हैं जो आज जीवित हैं पर उम्र की 70 या उससे ज़्यादा सीढ़ियाँ लांघ चुके हैं.

उस दौर में, मूल्यों की ज़्यादा बात होती थी. बुनियादी समस्याएं ज़्यादा उठाई जाती थीं तथा जनता के प्रति प्रतिबद्धता साफ़ साफ़ दिखाई देती थी.
जातिवाद, संप्रदायवाद की बातें कहने वाले आम जनता का सम्मान नहीं पाते थे. मज़दूरों, ग़रीबों और वंचितों के आंदोलन संगठित होने की कोशिश करते थे.
दरअसल आपातकाल भारतीय समाज को साफ़ साफ़ विभाजित करता है.
हम देख सकते हैं कि आपातकाल से पहले का भारत और आपातकाल के बाद का भारत कैसा है.
दुर्भाग्य की बात है कि आपातकाल की आलोचना लोकतंत्र पर प्रहार के लिए होती है, लेकिन आपातकाल के बाद ही सबसे ज़्यादा लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन हुआ है.
छात्र और युवा आंदोलनों की हत्या तो आपातकाल के बाद बनी जनता दल सरकार ने बेरहमी से कर दी. मज़े की बात कि लोकतांत्रिक संस्थानों का ह्रास भी आपातकाल के बाद ज़्यादा हुआ है.
आपातकाल से पहले की संसद की कार्यवाही देखनी चाहिए. कैसे सांसद होते थे, कितनी तैयारी करते थे, कैसी बहसें होती थी, तथा जो समाज सेवा या राजनीति के क्षेत्र में थे उनकी कितनी इज्ज़त होती थी.
आज ऐसा लगता है जैसे राजनीति या समाजसेवा शुद्ध गाली बन गई है.
आपातकाल के दौरान पत्रकारिता भी श्रीहीन हो गई थी पर उसके बाद लगभग दस वर्षों तक अपनी धाक जमा आज वह भी राजनीति के समानांतर ही चल रही है.
हमने आपातकाल को कभी अध्ययन का विषय नहीं बनाया, इसीलिए आज अधिकतर लोग आपातकाल के बारे में जानते ही नहीं है, विशेषकर नौज़वानों के बारे में यह कहा जा सकता है.
आपातकाल को लेकर केवल रस्मी समारोह 26 जून को होते हैं, पर आपातकाल का अंधेरा, उसका दर्द जयप्रकाश नारायण की पीड़ा, राजनीति का बदलाव और भटकाव और आपातकाल से सहानुभूति पाए लोगों द्वारा किए गए कामों का आकलन होता ही नहीं है.
आपातकाल के दौरान बहुत से ऐसे लोग थे जिन्होंने संघर्ष कर रहे लोगों की मदद की थी पर उन्हें इसका श्रेय मिला ही नहीं.
विजय तेंदुलकर, पापुलर पब्लिशिंग के स्वर्गीय रामदास, प्रिया तेंदुलकर, अमोल पालेकर, श्याम बेनेगल, मणिकौल, अनंतनाग तथा आनंद पटवर्धन का नाम न भूलने वाला है.
स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, गणेश मंत्री, सुरेंद्र प्रताप सिंह. उन दिनों के फ़िल्म फ़ेयर के संपादक ठाकुर विक्रम सिंह, परफ़ॉर्मिंग आर्ट्स की रजनी पटेल मदद करने वालों में हमेशा अगुआ रहे.
बनारस के प्रसिद्ध औघड़ भगवान राम हमेशा मदद करते रहे जबकि मोरारजी देसाई और इंदिरा गाँधी दोनों उनके शिष्य थे.
कर्नाटक की फ़िल्म स्टार स्नेहलता रेड्डी और उनकी बेटी नंदना रेड्डी भी हमेशा मदद करती रहीं.
चेन्नई के एमएस अप्पाराव और उनकी बेटी अमुक्ता अप्पाराव ने बहुत से ख़तरे उठाए.
कांग्रेस से जुड़े रहे डॉ कर्ण सिंह व स्वर्गीय ललित सेन ने भी आपातकाल विरोधियों की काफी मदद की. यह सूची काफ़ी लंबी हो सकती है.
पर यक्ष प्रश्न अब भी जीवित है कि क्यों आम जनता आपातकाल के विरोध में खड़ी नहीं हुई और क्यों इंदिरा गाँधी ने चुनावों की घोषणा की.
जबकि उन पर कोई दवाब नहीं था अगर दबाव रहा होगा तो जवाहरलाल नेहरू की बेटी होने का रहा होगा।
संतोष भारतीय
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक
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1 comments:

  1. arvind ji, mai aapse phone par baat karna chahta hoon,aap aisa likhte hai, ki aap se prabhawit hue bina nahi raha jaa sakta hai.

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